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असी, दस साल की मेहनत, और उस कीमत की कहानी जो “इंडस्ट्री की पसंदीदा नहीं होने” के बदले चुकानी पड़ती है
Taapsee Pannu in Assi film poster with face paint and trailer text
तापसी पन्नू शिकायत नहीं करतीं। वो डायग्नोसिस करती हैं। दोनों में एक बुनियादी फर्क है — एक सिर्फ भावनात्मक निकास है, दूसरा एक संरचनात्मक सवाल है जो सुनने वाले को मजबूर करता है कि वो या तो अपनी पोजीशन का बचाव करे या खुद से पूछे कि वो गलत तो नहीं है। Galatta Plus के साथ अपनी फिल्म असी के प्रमोशन के दौरान तापसी ने साफ कर दिया कि वो किस मोड में बात कर रही थीं। वो सवाल जो वो “कुछ टॉप डायरेक्टर्स” से मीटिंग में पूछती हैं — “आप एक ही चेहरे को बार-बार एक ही तरह के रोल में क्यों कास्ट करते हैं?” — रेटॉरिकल नहीं है। उन्हें जवाब चाहिए। और बॉलीवुड में 10 साल बिताने के बाद, बिना किसी फिल्मी परिवार के, बिना किसी गॉडफादर के — उन्होंने पाया है कि इंडस्ट्री के पास संतोषजनक जवाब नहीं है।
वो कंफर्ट जोन जो दूसरों के मौके खा जाता है
Taapsee Pannu in patterned shirt with forest background
तापसी जिस मैकेनिज्म को “कम्प्लेसेंसी” कहती हैं, वो उन लोगों को दिखती ही नहीं जो उससे फायदा उठाते हैं — लेकिन उन लोगों को बिल्कुल साफ दिखती है जिनके हिस्से में कुछ नहीं आता। एक डायरेक्टर एक किरदार की कल्पना करता है। उस किरदार का एक टाइप होता है। डायरेक्टर की कल्पना — जो उसने पहले क्या काम करते देखा है और उसकी सोशल नेटवर्किंग कितनी है, उसी से बनती है — दो-तीन नाम उगलती है जो पहले भी ऐसे रोल कर चुकी हैं। वो उनमें से एक को कास्ट कर लेता है। वो एक्ट्रेस वही करती है जो वो हमेशा से करती आई है — क्योंकि रोल वही है जो उसे हमेशा मिलता रहा है। और यह चक्र एक बार फिर खुद को दोहरा देता है।
तापसी ने इस लूप को उस शख्स की सटीकता से बयान किया जो उन मीटिंग्स में बैठी है और बिना अपना नाम सुने शॉर्टलिस्ट बनते देखती रही है: “कोई सच में बॉक्स के बाहर सोचना नहीं चाहता। ऐसा नहीं है कि अगर मुझे किसी फिल्म में होना है तो उसमें कोई इश्यू होना ही चाहिए। मैं उनसे सच में पूछती हूं — आप एक ही चेहरे को एक ही तरह के रोल के लिए क्यों लेते हैं? यह उनके लिए भी अनफेयर है। और मुझ जैसे लोगों के लिए भी अनफेयर है जो अपने क्राफ्ट के साथ एक्सपेरिमेंट करना चाहते हैं। यह आपकी कम्प्लेसेंसी है एक डायरेक्टर के तौर पर — कि इस टाइप के किरदार के लिए सिर्फ यही चेहरे दिखते हैं। तो वो वही लाएंगी जो वो किसी और फिल्म में पहले ला चुकी हैं।”
यह तर्क सिर्फ तापसी के साथ इंसाफ का नहीं है — यह उस सिस्टम की क्रिएटिव गरीबी का है जो पहचान के लिए कास्टिंग करता है, संभावना के लिए नहीं। जब कोई डायरेक्टर बार-बार एक ही एक्ट्रेस को एक ही टाइप के रोल में कास्ट करता है, तो उसे वही मिलता है जो वो पहले से जानता है। लेकिन जब वो तापसी को वो रोल दे, तो वो कुछ ऐसा पाएगा जिसकी उसने कास्टिंग के वक्त कल्पना भी नहीं की होगी।
हर मीटिंग में दो लड़ाइयां
तापसी ने दो खास अड़चनें गिनाईं जिन्हें वो हर डायरेक्टर मीटिंग में असल बात शुरू होने से पहले ही तोड़ना पड़ता है। पहली: यह मान लेना कि अगर तापसी पन्नू किसी फिल्म में हैं, तो वो लीड होनी चाहिए और कहानी उन्हीं के बारे में होनी चाहिए — एक धारणा जो दोनों तरफ से उनके लिए सीमित करने वाली है, क्योंकि इसका मतलब है कि डायरेक्टर उन्हें सपोर्टिंग या एनसेंबल काम के लिए रूल आउट कर देते हैं — जहां उनकी रेंज सबसे अच्छी तरह दिख सकती थी। दूसरी: यह मान लेना कि उनकी मौजूदगी के लिए सोशल वेट जरूरी है — कि तापसी पन्नू की फिल्म में कोई इश्यू, कोई कॉज, कोई गंभीर विषय होना ही चाहिए — जिससे कुछ हल्का-फुल्का करने के लिए कास्टिंग की कल्पना में कोई जगह ही नहीं बचती।
दोनों धारणाएं, वो कहती हैं, इंडस्ट्री की उस आदत को दर्शाती हैं जो एक्टर्स को सिर्फ किरदार टाइप में नहीं बल्कि टोनल कैटेगरी में भी बांध देती है — तुम सीरियस एक्ट्रेस हो, तुम कमर्शियल हीरोइन हो, तुम ड्रामा स्पेशलिस्ट हो — और फिर चाहे एक्टर कुछ भी करके दिखाए, इस लेबल को रिवाइज करने से इनकार कर देती है।
डंकी का वो पल: दस साल की मेहनत का ईनाम
तापसी ने SCREEN से बात करते हुए जो सबसे ईमानदार बात कही, वो यह थी कि डंकी (राजकुमार हिरानी की शाहरुख खान की फिल्म, जिसमें उन्होंने स्टार रोल किया) जैसी फिल्म उन्हें रेगुलर बेसिस पर नहीं मिल सकती और बिना उन 10 सालों के उन्हें मिलती भी नहीं।
“मेरे जैसे किसी के लिए डंकी जैसी फिल्म मिलना मुश्किल है क्योंकि मैं कोई कमर्शियल, मेनस्ट्रीम, वायेबल हीरोइन नहीं हूं। मुझे वो मिली क्योंकि उस रोल के लिए शायद मेरे जैसे किसी की जरूरत थी। मुझे यही बताया गया है। यह इसलिए हुआ क्योंकि मैंने उससे पहले असी और गांधारी जैसी फिल्में कीं। इसी ने मुझे इंडस्ट्री में मेरी जगह और पहचान दी है।”
यह तर्क एक साथ इनाम भी है और जाल भी — वो अनकन्वेंशनल चुनावों ने वो पहचान बनाई जिसकी वजह से डंकी मिली, लेकिन वही पहचान उन्हें वो पहला नाम बना देती है जो किसी डायरेक्टर के दिमाग में तब आता है जब रोल मुश्किल और गंभीर हो — और आखिरी नाम बन जाती है जब रोल कुछ और हो।
असी: वो फिल्म जिसने यह पूरी बातचीत शुरू की
असी — अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित, 19 फरवरी 2026 को रिलीज — वो फिल्म है जो इन इंटरव्यूज के केंद्र में है। एक कोर्टरूम ड्रामा जिसमें तापसी राबी की भूमिका में हैं — एक दबंग वकील जो एक गैंगरेप सर्वाइवर (कानी कुसृति, ऑल वी इमेजिन ऐज लाइट) का केस लड़ रही है — फिल्म को समीक्षकों ने उनके करियर का अब तक का सबसे बेहतरीन काम करार दिया है।
The Federal ने उनके परफॉर्मेंस को “मैजेस्टेरियल” कहा — विशेष रूप से यह नोट करते हुए कि वो “क्रूसेडिंग डायलॉग और जोशीले भाषणों के साथ-साथ भेद्यता के चुने हुए पलों को भी उतनी ही खूबसूरती से निभाती हैं।” Indian Express ने 3 स्टार, New Indian Express ने 4 स्टार दिए। समीक्षक बाराद्वाज रंगन ने इसे “एक शक्तिशाली मेलोड्रामा जो बलात्कार पर तीन-आयामी नज़रिया पेश करता है” और सिन्हा का अब तक का सर्वश्रेष्ठ काम बताया।
गांधारी: अगला अध्याय
रिलीज की कतार में गांधारी है — देवाशीष मखीजा (भोंसले, जोरम) द्वारा निर्देशित, कनिका धिल्लन द्वारा लिखित (उनका छठा कोलेबोरेशन), जिसमें तापसी एक मां की भूमिका में हैं जो अपनी अग़वा हुई बेटी को ढूंढने के मिशन पर निकल पड़ी है। Netflix पर रिलीज के लिए तैयार यह फिल्म उनके अनकन्वेंशनल चुनावों के पैटर्न को आगे बढ़ाती है। गांधारी के बाद वो एक कॉमेडी ड्रामा करना चाहती हैं — जो उन डायरेक्टर्स के लिए सबसे सीधा जवाब होगा जो मानते हैं कि वो सिर्फ इश्यू-बेस्ड फिल्में कर सकती हैं।
आउटसाइडर का सवाल: दस साल बाद भी खुला हुआ
तापसी का यह तर्क — जो वो अपने करियर में कई बार अलग-अलग रूपों में रख चुकी हैं — सिर्फ नेपोटिज्म की शिकायत नहीं है। वो इसे लेकर काफी न्यूआंस्ड रही हैं: उन्होंने माना है कि स्टार किड्स में एक एकता होती है जो आउटसाइडर्स में नहीं होती, कि आउटसाइडर्स एक-दूसरे की मदद करने के बजाय आपस में ज्यादा कॉम्पिटिटिव होते हैं। उन्होंने बार-बार कहा है कि दर्शकों की भूमिका भी मायने रखती है — कि आउटसाइडर की सफलता के लिए दर्शकों को टिकट खरीदना होगा, एडवांस बुकिंग करनी होगी।
लेकिन इस हफ्ते असी के इंटरव्यूज में जो परत उन्होंने जोड़ी है, वो दर्शकों की पसंद और कास्टिंग के फैसले के बीच की उस जगह की बात है: डायरेक्टर्स की कल्पना। वो शॉर्टलिस्ट जो किसी के दिमाग में एक भी मीटिंग से पहले, एक भी ऑडिशन से पहले बन जाती है — वही वो कमरा है जहां मौका या तो होता है या नहीं होता। तापसी कह रही हैं कि वो काफी मीटिंग्स में जा चुकी हैं जहां वो उस लिस्ट में नहीं थीं — और वो उन डायरेक्टर्स से उस लिस्ट की लॉजिक पूछना चाहती हैं। शिकायत के तौर पर नहीं, बल्कि इसलिए कि वो लॉजिक जांच पर टिकती नहीं है — और उन्हें शक है कि वो खुद भी यह जानते हैं।
“जब मैं ऐसा करूंगी, तो मैं टेबल पर कुछ नया लेकर आऊंगी।”
यह एक वादा भी है और एक चुनौती भी। और असी — जिसके हर रिव्यू में उनके परफॉर्मेंस को “मैजेस्टेरियल,” “पावरफुल,” “स्पेक्टेकुलर” कहा गया है — इस सवाल का इस वक्त का जवाब है कि वो इसे बैक अप कर सकती हैं या नहीं।
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