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Sridevi vs Rekha: Fans Still Divided After 40 Years
जब दक्षिण की “हवा हवाई” उत्तर की “उमराव जान” से मिली — श्रीदेवी और रेखा की वो कहानी जो सिर्फ सिनेमा नहीं, एक युग था
1980 के दशक में हिंदी सिनेमा की नायिकाओं के बारे में जब भी बात होती है, दो नाम ऐसे हैं जो एक साथ उठते हैं और एक-दूसरे से इतने अलग हैं कि उनकी तुलना करना ही अपने आप में एक कला है। एक तरफ थी श्रीदेवी — चार साल की उम्र से परदे पर, दक्षिण की धरती से उठकर हिंदी सिनेमा पर राज करने आई, जिसकी आँखें बोलती थीं, जिसके पाँव में ताल था और जिसने यह साबित किया कि एक औरत अकेले सुपरस्टार हो सकती है। दूसरी तरफ थी रेखा — जो नाजायज़ पैदाइश के कलंक को ढोते हुए इंडस्ट्री में आई, जिसे “काली, मोटी और बदसूरत” कहा गया, जिसके पिता ने पहचानने से इनकार किया, और जिसने इन सब अपमानों को अपना कच्चा माल बनाकर ऐसा सोना गढ़ा जिसकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी।
ये दोनों न सिर्फ अपने-अपने दशक की सबसे बड़ी अभिनेत्रियाँ थीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक भी थीं। जब रेखा की पीढ़ी का सूरज ढल रहा था, श्रीदेवी का सितारा चढ़ रहा था। और जो बात इस कहानी को सबसे ख़ूबसूरत बनाती है, वो यह है कि ये दोनों दुश्मन नहीं थीं — रेखा ने ही श्रीदेवी को हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना रास्ता बनाने में मदद की। जान्हवी कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा: “माँ जब पहली बार हिंदी फ़िल्मों में आईं तो बहुत खोई-खोई सी थीं। रेखा दीदी ने उन्हें अपने पंखों तले ले लिया। वे दोनों soul sisters थीं — और कभी-कभी हमसे राज़ छुपाने के लिए तेलुगु में बात करने लगती थीं।” यह detail बताती है कि इन दोनों का रिश्ता प्रतिद्वंद्विता से कहीं गहरा था।
दो बचपन, दो दर्द
श्रीदेवी का पूरा नाम श्री अम्मा येंगर अय्यपन था। जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के शिवकाशी में हुआ। मात्र चार साल की उम्र में 1967 की तमिल फ़िल्म “कंदन करुणाई” से परदे पर आई — बच्चों की भूमिका में, भगवान मुरुगा के रूप में। 1969 में “थुनैवन” में पहली बड़ी बाल भूमिका मिली। 1971 में मलयालम फ़िल्म “पूम्पट्टा” में सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का केरल राज्य पुरस्कार मिला। यानी श्रीदेवी का बचपन परदे पर गुज़रा — वो बचपन जिसमें आम बच्चे स्कूल जाते हैं, वहाँ श्रीदेवी शूटिंग करती थीं। उनकी माँ राजेश्वरी और पिता अय्यपन ने उन्हें सहारा दिया, लेकिन इस परवरिश ने उन्हें एक ऐसा अभिनेत्री बनाया जो जन्म से कैमरे के सामने होना जानती थी।
रेखा की कहानी ज़्यादा कठिन है, ज़्यादा दर्दनाक है और इसीलिए ज़्यादा ताकतवर भी। उनका असली नाम भानुरेखा गणेशन था। जन्म 10 अक्टूबर 1954 को Chennai में हुआ। माँ थीं तेलुगु अभिनेत्री पुष्पावली, और पिता थे तमिल सुपरस्टार जेमिनी गणेशन — जिन्होंने अपनी नाजायज़ संतान को कभी स्वीकार नहीं किया। रेखा ने एक बार कहा था: “मुझे नहीं पता ‘पिता’ शब्द का मतलब क्या होता है। उन्होंने मुझे कभी notice ही नहीं किया।” 13-14 साल की उम्र में नौवीं कक्षा छोड़ दी क्योंकि घर में पैसे नहीं थे। माँ ने कहा — acting करो। रेखा को acting में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो flight attendant बनना चाहती थीं। लेकिन माँ की ज़रूरत के सामने अपनी ख़्वाहिश दफन करके वो दरवाज़े खटखटाने निकल पड़ीं। किशोरावस्था में उन्होंने आत्महत्या का प्रयास भी किया था — उस दर्द को कोई शब्द नहीं दे सकता जो एक बच्ची तब महसूस करती है जब उसके अपने पिता उसे नहीं पहचानते।
हिंदी सिनेमा में आगमन: दो अलग दरवाज़े
रेखा 1969 में मुंबई आईं। शुरुआत “सावन भादो” (1970) से हुई जो हिट रही। लेकिन तब वो “काली, मोटी और बदसूरत” वाले टैग से लड़ रही थीं। इंडस्ट्री में उन्हें South Indian features की वजह से dismiss किया जाता था। 1976 में सब कुछ बदला — उन्होंने अपना रूप-रंग बदला, हिंदी की तैयारी की, yoga से शरीर बदला, और “दो अनजाने” में अमिताभ बच्चन के साथ एक ऐसी भूमिका निभाई जिसने पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया। यह transformation सिर्फ बाहरी नहीं था — यह एक अभिनेत्री का अपनी शर्तों पर जीने का फैसला था।
श्रीदेवी ने हिंदी में पहली बार 1979 में “सोलवाँ सावन” से कोशिश की, जो चली नहीं। वो वापस South में लौट गईं। लेकिन 1983 में K. Raghavendra Rao की “हिम्मतवाला” ने सब बदल दिया। जीतेंद्र के साथ इस फ़िल्म ने ₹12 करोड़ कमाए और 1983 की सबसे बड़ी हिट बन गई। प्रेस ने पहले उन्हें “thunder thighs” जैसे अपमानजनक नाम दिए थे — लेकिन “हिम्मतवाला” के बाद वही प्रेस उन्हें “First Female Superstar of Bollywood” कह रही थी। हालाँकि श्रीदेवी ने खुद एक interview में कहा था कि “हिम्मतवाला” उनके लिए “bad luck” थी — क्योंकि उस फ़िल्म की सफलता ने उन्हें एक खाँचे में बंद कर दिया जिससे बाहर निकलने में बरसों लगे।
वो फ़िल्में जिन्होंने इतिहास लिखा
रेखा की सबसे परिभाषित फ़िल्म “उमराव जान” (1981) है। मुज़फ्फर अली के निर्देशन में बनी यह फ़िल्म मिर्ज़ा हादी रुस्वा के उर्दू उपन्यास “उमराव जान अदा” पर आधारित थी। रेखा ने 19वीं सदी की लखनऊ की तवायफ और शायरा उमराव जान की भूमिका में खुद को इस तरह डुबोया कि परदे और हकीकत की सीमा मिट गई। नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख और राज बब्बर जैसे दिग्गजों के साथ काम करते हुए भी रेखा इस फ़िल्म की आत्मा थीं। 29वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में “उमराव जान” ने 4 पुरस्कार जीते, जिनमें रेखा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्म average रही — लेकिन कला के तराज़ू पर यह अमर है।
श्रीदेवी की करियर-परिभाषित फ़िल्मों की सूची कहीं लंबी और ज़्यादा विविध है। “नगीना” (1986) ने उन्हें एक certified #1 star बना दिया — एक ऐसी फ़िल्म जिसमें वो नागिन बनीं और “मैं तेरी दुश्मन” पर जो dance किया वो आज भी cultural memory में ज़िंदा है। “मिस्टर इंडिया” (1987) में उनकी comedy, उनका “हवा हवाई”, उनका Charlie Chaplin tribute — यह साबित करते हैं कि वो सिर्फ glamour नहीं थीं, एक complete performer थीं। “चालबाज़” (1989) में उन्होंने double role निभाया और Filmfare Best Actress जीता। “चाँदनी” (1989) में उन्होंने एक ऐसी रोमांटिक भूमिका निभाई जो पूरी तरह उनके पिछले किरदारों से अलग थी। नीचे दोनों की प्रमुख फ़िल्में:
श्रीदेवी और रेखा: बॉक्स ऑफिस पर छाई वो चमक
श्रीदेवी और रेखा दोनों ने 1980-90 के दशक में बॉलीवुड पर राज किया। श्रीदेवी को मास एंटरटेनर ब्लॉकबस्टर के लिए जाना जाता है, जबकि रेखा ने क्लासिक और आलोचनात्मक रूप से सराही गई भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ी। नीचे उनकी प्रमुख फ़िल्मों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत है।
| वर्ष | श्रीदेवी | वर्डिक्ट | रेखा | वर्डिक्ट |
|---|---|---|---|---|
| 1981 | — | — | उमराव जान | क्लासिक / National Award |
| 1983 | हिम्मतवाला | ब्लॉकबस्टर | — | — |
| 1986 | नगीना | ब्लॉकबस्टर | उत्सव | कल्ट क्लासिक |
| 1987 | मिस्टर इंडिया | ब्लॉकबस्टर | — | — |
| 1989 | चालबाज़ / चाँदनी | ब्लॉकबस्टर | — | — |
| 1991 | लम्हे | कल्ट क्लासिक | — | — |
| 1992 | खुदा गवाह | ब्लॉकबस्टर | — | — |
| 1997 | मृत्युदाता | फ्लॉप | — | — |
| 2012 | इंग्लिश विंग्लिश | ब्लॉकबस्टर | — | — |
श्रीदेवी की फ़िल्में अक्सर व्यावसायिक सफलता के साथ आईं, जबकि रेखा की फ़िल्में कलात्मक गहराई और पुरस्कारों के लिए जानी जाती हैं। दोनों ने अलग-अलग तरीकों से भारतीय सिनेमा को समृद्ध किया।
अभिनय की दो दुनियाएँ
रेखा का अभिनय हमेशा भीतर से बाहर आता है। उनके लिए हर किरदार एक confession है — एक ऐसा स्वीकारोक्ति जो उनकी अपनी ज़िंदगी के दर्द से रंगी होती है। “उमराव जान” में उमराव का वो दर्द — जो प्यार पाती है लेकिन पा नहीं सकती, जो समाज के हाशिये पर है लेकिन उसकी शायरी उस समाज से बड़ी है — यह दर्द रेखा को बाहर से नहीं मिला। यह उनके अपने जीवन में था। इसीलिए उमराव जान सिर्फ एक किरदार नहीं लगती — वो रेखा की आत्मकथा का एक अध्याय लगती है। 1980 के दशक में parallel cinema की तरफ उनका रुझान — “कल्याग” (1981), “विजेता” (1983), “उत्सव” (1985) — यह बताता है कि वो हमेशा commercial success से ज़्यादा artistic depth को तरजीह देती रहीं।
श्रीदेवी का अभिनय शरीर की भाषा में है। उनकी आँखें, उनका चेहरा, उनके हाथ — सब एक साथ बोलते हैं। जब “चालबाज़” में वो दो बिल्कुल अलग किरदार निभाती हैं — एक डरी हुई, दूसरी बेखौफ — तो दोनों के बीच का फ़र्क सिर्फ संवाद से नहीं, पूरे शरीर की बनावट से आता है। उनकी comedy का timing इतना सटीक था कि उस दौर के कई पुरुष अभिनेता उनके सामने फीके पड़ जाते थे। “इंग्लिश विंग्लिश” (2012) में एक middle-class housewife का वो सूक्ष्म दर्द जो वो आँखों से व्यक्त करती हैं — यह बताता है कि उनका हुनर उम्र के साथ और गहरा हुआ था। अगर एक शब्द में कहें: रेखा कविता थीं, श्रीदेवी नृत्य थीं।
पुरस्कार और सम्मान
रेखा के प्रमुख पुरस्कारों में सबसे बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार है जो “उमराव जान” (1981) के लिए मिला। इसके अलावा Filmfare Best Actress Awards “खूबसूरत” (1980) और “इजाज़त” (1987) के लिए मिले। 2010 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया। वे राज्यसभा सदस्य भी रह चुकी हैं। उनकी जीवनी “Rekha: The Untold Story” यासिर उस्मान द्वारा 2016 में प्रकाशित हुई और एक बड़ी साहित्यिक घटना बनी।
श्रीदेवी को Filmfare Best Actress Award “चालबाज़” (1989) और “लम्हे” (1991) के लिए मिला। 2013 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया। 2018 में दुबई में उनका असामयिक निधन हुआ — वो 54 साल की थीं। उनकी मृत्यु के बाद “Mom” (2017) के लिए उन्हें मरणोपरांत National Film Award से सम्मानित किया गया। वह पुरस्कार उनकी बेटी जान्हवी कपूर ने स्वीकार किया — एक ऐसा पल जिसे देखकर पूरा देश रो पड़ा था।
दोनों का सांस्कृतिक प्रभाव: परदे से परे
रेखा ने हिंदी सिनेमा को यह सिखाया कि एक नायिका को glamour और depth — दोनों एक साथ हो सकते हैं। उन्होंने उस दौर में parallel cinema को embrace किया जब mainstream actresses ऐसा नहीं करती थीं, और यह साबित किया कि stardom और artistry आपस में दुश्मन नहीं हैं। उनकी style — वो साड़ियाँ, वो sindoor, वो surma — आज भी एक cultural code है जिसे Bollywood बार-बार quote करता है।
श्रीदेवी ने यह साबित किया कि एक अभिनेत्री hero हो सकती है — literally। उनके दौर से पहले heroine hero की कहानी में एक accessory होती थी। श्रीदेवी के बाद heroine ही story थी। “मिस्टर इंडिया,” “नगीना,” “चालबाज़” — इन फ़िल्मों में वो केंद्र में थीं, न सिर्फ रोमांटिक साझीदार के रूप में। उनके बाद आई हर actress — माधुरी दीक्षित से लेकर दीपिका पादुकोण तक — किसी न किसी रूप में उनकी उत्तराधिकारी है।
(FAQ)
श्रीदेवी को “पहली महिला सुपरस्टार” क्यों कहते हैं?
श्रीदेवी वो पहली अभिनेत्री थीं जिनकी फ़िल्में सिर्फ उनके नाम पर चलती थीं — hero की ज़रूरत नहीं थी। “हिम्मतवाला,” “नगीना,” “चालबाज़” जैसी फ़िल्में उनके दम पर blockbuster बनीं। ₹11 लाख प्रति फ़िल्म की fee लेकर वो उस दौर की सबसे ज़्यादा कमाने वाली actress थीं।
रेखा को राष्ट्रीय पुरस्कार किस फ़िल्म के लिए मिला था?
रेखा को 29वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में “उमराव जान” (1981) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस फ़िल्म को कुल 4 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे।
क्या श्रीदेवी और रेखा के बीच दुश्मनी थी?
नहीं। जान्हवी कपूर के अनुसार रेखा ने श्रीदेवी को हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में नई होने पर अपना रास्ता बनाने में मदद की। दोनों “soul sisters” थीं और कभी-कभी बच्चों से राज़ छुपाने के लिए तेलुगु में बात करती थीं।
श्रीदेवी ने अपना करियर कितनी छोटी उम्र में शुरू किया?
श्रीदेवी ने मात्र 4 साल की उम्र में 1967 की तमिल फ़िल्म “कंदन करुणाई” से अपना करियर शुरू किया। 1971 में “पूम्पट्टा” के लिए उन्हें केरल राज्य सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार पुरस्कार मिला।
रेखा के पिता कौन थे और उनका रेखा से क्या रिश्ता था?
रेखा के पिता तमिल सुपरस्टार जेमिनी गणेशन थे। उन्होंने रेखा की माँ पुष्पावली से शादी नहीं की और रेखा को कभी अपनी बेटी के रूप में स्वीकार नहीं किया। रेखा ने कहा था: “मुझे नहीं पता पिता शब्द का मतलब क्या होता है।”
श्रीदेवी की “हिम्मतवाला” के बारे में उन्होंने क्या कहा था?
श्रीदेवी ने एक 1987 के interview में कहा था कि “हिम्मतवाला” उनके लिए “bad luck” थी, क्योंकि उस फ़िल्म की सफलता ने उन्हें एक image में बंद कर दिया। वो चाहती थीं कि उनकी पहचान एक serious actress के रूप में हो, न केवल एक glamour star के रूप में।
2026 में दोनों का legacy कैसे ज़िंदा है?
श्रीदेवी का प्रभाव उनकी बेटी जान्हवी कपूर के करियर में, “Mom” (2017) के मरणोपरांत National Award में, और Bollywood की हर उस actress में ज़िंदा है जो अकेले एक फ़िल्म carry करती है। रेखा आज भी सक्रिय हैं — उनकी जीवनी पर काम जारी है और हर बड़े award function पर उनकी उपस्थिति एक cultural event बन जाती है।
