Kerala Story 2 release blocked: केरला हाई कोर्ट ने थिएटर से 18 घंटे पहले लगाया स्टे, सेंसर बोर्ड को कहा “दिमाग नहीं लगाया”

द केरला स्टोरी 2: गोज़ बियॉन्ड — 2023 की उस हिंदी फिल्म का सीक्वल जो उस साल की सबसे विवादित बॉक्स-ऑफिस कहानी बन गई थी — 27 फरवरी 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ होनी थी। लेकिन हुई नहीं। केरला हाई कोर्ट ने फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट को चुनौती देने वाली तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए गुरुवार, 26 फरवरी को अंतरिम स्टे ऑर्डर जारी कर दिया — पहले मॉर्निंग शो से महज 18 घंटे पहले — और स्पष्ट किया कि याचिकाओं पर पूरी सुनवाई से पहले फिल्म रिलीज़ नहीं होगी। कोर्ट ने अपने आदेश में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) को भी कड़ी फटकार लगाई — कहा कि बोर्ड ने फिल्म क्लियर करते वक्त “दिमाग नहीं लगाया” — और उसे निर्देश दिया कि वो याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों की ठीक से जांच करे। निर्माताओं ने कहा है कि वो इस आदेश को चुनौती देने के लिए उसी कोर्ट की बड़ी बेंच के सामने तुरंत जाएंगे।

फिल्म क्या है: कहानी, कास्ट, और डायरेक्टर

द केरला स्टोरी 2: गोज़ बियॉन्ड का निर्देशन कामाख्या नारायण सिंह ने किया है और इसे विपुल अमृतलाल शाह की Sunshine Pictures ने प्रोड्यूस किया है — वही निर्माता जिन्होंने 2023 की ओरिजिनल फिल्म बनाई थी। सीक्वल में उल्का गुप्ता, आदिति भाटिया, और ऐश्वर्या ओझा मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश की तीन हिंदू लड़कियों के इर्द-गिर्द है, जिनके एक-एक मुस्लिम पुरुष के साथ संबंध हैं — और निर्माताओं के अपने शब्दों में, यह कहानी बताती है कि वो रिश्ते “सामाजिक और भावनात्मक दबाव” में कैसे बदलते हैं, जिसमें कथित धर्मांतरण, दबाव, और विश्वास टूटने के दृश्य हैं। निर्माताओं ने हमेशा कहा है कि फिल्म “सच्ची घटनाओं” पर आधारित है और असली अदालती मामलों से ली गई है।

कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही फिल्म को CBFC ने 16 कट्स दिए — इंटिमेट सीन और असॉल्ट सीक्वेंस आधे काट दिए गए — और U/A सर्टिफिकेट (12 साल से कम उम्र के दर्शकों के लिए अभिभावक की सलाह ज़रूरी) दिया। लेकिन वही सर्टिफिकेशन अब कोर्ट की जांच के दायरे में आ गया है।

याचिकाकर्ता: तीन चुनौतियां, दो मानी गईं

केरला हाई कोर्ट के सामने तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं।

पहली याचिका कन्नूर के बायोलॉजिस्ट श्रीदेव नम्बूदिरी ने दायर की — जिन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म का टाइटल, टीज़र, और ट्रेलर ऐसे थीम और डायलॉग्स से भरे हैं जो सांप्रदायिक हिंसा भड़का सकते हैं और केरल राज्य व उसके लोगों को गलत तरीके से बदनाम करते हैं। उनकी खास आपत्ति टीज़र की आखिरी लाइन “अब सहेंगे नहीं… लड़ेंगे” पर थी — जिसे उन्होंने सांप्रदायिक परिणामों वाला सीधा आह्वान बताया। उन्होंने U/A सर्टिफिकेट रद्द करने की मांग की।

दूसरी याचिका फ्रेडी वी फ्रांसिस ने दायर की — जिन्होंने फिल्म के टाइटल में “केरला” शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि फिल्म की कहानी का केरल की असली सामाजिक हकीकत से कोई ठोस संबंध नहीं है और निर्माताओं का “सच्ची घटनाओं पर आधारित” दावा सवालों के घेरे में है।

तीसरी याचिका अधिवक्ता अतुल रॉय ने दायर की — जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। लेकिन नम्बूदिरी और फ्रांसिस की याचिकाओं पर अंतरिम स्टे ऑर्डर पास हुआ।

कोर्ट ने क्या कहा: CBFC सीधे निशाने पर

जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने गुरुवार को स्टे ऑर्डर सुनाया। कोर्ट की आलोचना सिर्फ फिल्म तक सीमित नहीं रही — उसका निशाना उस संस्था पर था जिसने फिल्म को क्लियर किया: CBFC। कोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने U/A सर्टिफिकेट देने से पहले याचिकाकर्ताओं की चिंताओं को ठीक से नहीं जांचा — और कहा कि बोर्ड ने “दिमाग नहीं लगाया।” कोर्ट ने CBFC को निर्देश दिया कि वो अगली सुनवाई से पहले याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर गंभीरता से विचार करे।

बुधवार को हुई प्रारंभिक सुनवाई में ही कोर्ट यह टिप्पणी कर चुका था कि याचिकाकर्ताओं की चिंताएं “शायद वाजिब हैं” — एक ऐसी टिप्पणी जिसने स्टे से पहले ही कोर्ट का रुझान जाहिर कर दिया था। निर्माताओं के वरिष्ठ वकील एस. श्रीकुमार ने लोकस स्टैंडी का मुद्दा उठाया — तर्क दिया कि याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं हैं और उनकी शिकायत PIL के रूप में होनी चाहिए — लेकिन कोर्ट ने इसके बावजूद स्टे पास कर दिया। मामला अगली सुनवाई तक स्थगित है और स्टे तब तक लागू रहेगा।

रिलीज़ से पहले का विवाद

यह विवाद कोर्ट से शुरू नहीं हुआ। जिस पल टीज़र आया, उसी पल से द केरला स्टोरी 2 को वैसी ही ध्रुवीकृत राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतिक्रिया मिली जो 2023 में पहली फिल्म को मिली थी। राजनेताओं, फिल्मकारों और सार्वजनिक हस्तियों ने इसे प्रोपगेंडा बताया — उन्होंने कहा कि यह एक पैटर्न है: चरम हाशिए के मामलों को किसी समुदाय और राज्य का प्रतिनिधित्व बताना। ट्रेलर को, जैसा Hindustan Times ने लिखा, “विभाजनकारी प्रतिक्रियाएं मिलीं, कई ने इसे अतिरंजित बताया।”

डायरेक्टर कामाख्या नारायण सिंह — जिनका डॉक्यूमेंट्री में बैकग्राउंड है और जिन्होंने अपनी रिसर्च को फिल्म की विश्वसनीयता का आधार बताया — ने आलोचकों को एक ऐसा जवाब दिया जिसमें विशिष्टता थी: “अगर हमने फिल्म में कुछ भी गलत दिखाया है तो मैं फिल्ममेकिंग छोड़ दूंगा।” प्रोड्यूसर विपुल शाह ने कहा: “हमारा मकसद हमेशा जागरूकता फैलाना रहा है — युवाओं को सतर्क और जागरूक निर्णय लेने के लिए सशक्त करना।”

फिल्म की शूटिंग “कड़े सुरक्षा इंतजामों” के साथ पूरी हुई — जो दर्शाता है कि कैमरे बंद होने से पहले ही प्रोडक्शन के इर्द-गिर्द कितना खतरा महसूस किया जा रहा था।

अब क्या होगा

निर्माताओं ने पुष्टि की है कि वो केरला हाई कोर्ट की बड़ी बेंच के सामने तुरंत अपील करेंगे। रिलीज़ टीम गुरुवार को ही अपील दायर करने की कोशिश में थी — और विस्तृत ऑर्डर जल्द जारी करने का अनुरोध किया ताकि बिना प्रोसेजरल देरी के दलीलें दी जा सकें। हर गुज़रता दिन सीधे बॉक्स-ऑफिस के नुकसान में तब्दील होता है — ओपनिंग वीकेंड की चौड़ी थिएटर रिलीज़ ऐसी किसी भी फिल्म की कमर्शियल नींव होती है।

CBFC इस बीच अपने ही सर्टिफिकेशन फैसले की दोबारा जांच करने के कोर्ट निर्देश की असहज स्थिति में है। अगर बोर्ड इस पर गंभीरता से अमल करता है तो नतीजा और कट्स या रिलीज़ पर शर्तें हो सकती हैं जो निर्माताओं को मंज़ूर नहीं।

बड़ा संदर्भ: एक फिल्म जो एक परिचित राह पर चल रही है

ओरिजिनल द केरला स्टोरी — मई 2023 में सुदीप्तो सेन के निर्देशन में रिलीज़ — को पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बैन किया गया था, कई अदालतों में चुनौती दी गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य डिस्क्लेमर के साथ स्क्रीनिंग की इजाजत दी थी — और अंततः फिल्म ने ₹300 करोड़ से अधिक का बिजनेस किया। सीक्वल को वही प्रोड्यूसर, वही विषय, वही “सच्ची घटनाओं पर आधारित” फ्रेमिंग, और कानूनी चुनौती की वही निश्चितता विरासत में मिली है।

इस बार जो अलग है वो यह है कि स्टे रिलीज़ से पहले आया, बाद में नहीं — यानी फिल्म को वो मौका नहीं मिला जो पहली फिल्म को मिला था: कोर्ट के दखल से पहले बॉक्स-ऑफिस पर रफ्तार पकड़ने का। अगले 24-48 घंटे यह तय करेंगे कि बड़ी बेंच इतनी जल्दी सुनवाई करती है कि फरवरी में रिलीज़ हो सके — या फिर यह फिल्म उन हिंदी फिल्मों की लंबी सूची में शामिल हो जाती है जिनकी थिएटर यात्रा अदालती लड़ाइयों से हमेशा के लिए बदल गई।

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